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एसजेवीएन के साथ पढ़ाई
परियोजना प्रभावित परिवारों से मिलने पर यह जानकर
हैरानी होती है कि नाथपा झाकड़ी परियोजना से उनको पहुंचे
लाभों से ज्यादा महत्व उनके लिए इस बात का है कि परियोजना
के बनने से उनके बच्चों के जीवन बेहतर हुए हैं। सड़क
द्वारा शिमला से सात घंटे तक लेने वाला पर्वतीय इलाका
एसजेवीएन के सौजन्य से हि.प्र. में शिक्षा के सर्वोत्तम
केन्द्रों में से एक केन्द्र बन गया है।
700 छात्रों वाला झाकड़ी स्थित सीनियर सेकेण्डरी स्कूल एक छोटे एवं मामूली से भवन में अवस्थित था। परियोजना की संकल्पना के समय किए गए वायदे के अनुसार एसजेवीएन द्वारा स्कूल के लिए 52 लाख रूपए की अनुदान राशि दिए जाने और स्कूल का पुनरूद्धार किए जाने के फलस्वरूप इसका कायाकल्प हो गया है। स्कूल का नया भवन, नए ब्लैकबोर्ड एवं शिक्षा सामग्री, नया मैदान एसजेवीएन द्वारा दिए गए वचन को पूरा किए जाने के गवाह है।
इससे भी बढ़िया दिल्ली पब्लिक स्कूल, झाकड़ी है जो पूर्णतः एसजेवीएन की पहल एवं धैर्य का परिणाम है। इस स्कूल में बेहतरीन पुस्तकालय, विज्ञान प्रयोगशाला हैं जिनकी तुलना भारत के सर्वश्रेष्ठ स्कूलों से की जा सकती है। स्कूल का सकूनभरा लैण्डस्केप है और यहां पड़ोसी शहरों जैसे रामपुर तक से छात्र पढ़ने आते हैं।
इस स्कूल की स्थापना 1994 में हुई । श्रीमती तनु बंसल, जिन्होंने यह स्कूल 1995 में ज्वाइन किया था, कहती हैं, " उस समय इस स्कूल में हम 12 अध्यापक एवं 200 बच्चे थे। आज हम 32 अध्यापक एवं 600 छात्र हैं। असल में 670 छात्र हैं - 60% एसजेवीएन टाऊîनशिप से और 40% बाहर से हैं। उल्लेखनीय है कि 670 में से 211 छात्र परियोजना प्रभावित परिवारों से हैं।
निगम परियोजना प्रभावित बच्चों की शिक्षा के लिए सब्सिडी देता है। उदाहरणतः, दसवीं कक्षा में परियोजना प्रभावित परिवारों सहित एसजेवीएन से संबंधित छात्र 360/- रूपए प्रतिमाह और अन्य 650/- रूपए प्रति माह की फीस अदा करते हैं। एसजेवीएन ने स्कूल के शुरूआती निर्माण पर रु.2 करोड़ खर्च किए थे। वर्तमान स्कूल को " सहायता अनुदान " दिया जाता है जो पिछले वर्ष रु.62 लाख था।
डीपीएस (झाकड़ी) का पांच एकड़ का विस्तृत कैम्पस है। स्कूल में पी.सी. से लेकर स्वच्छ क्लासरूम और आडोटोरियम है और यहां के लोगों की पहुंच में यह बेहतरीन स्कूल है। यह स्कूल पर्यावरणीय रूप से भी संवेदनशील है। स्कूल के खेल के मैदान के निर्माण के लिए नाथपा में बांध के निर्माण के समय निकली मिट्टी उपयोग की गई है। इस मैदान के नीचे की परत " बनाने " के लिए इसमें मलबा भरा गया है।
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