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मलबे की डंपिंग - एसजेवीएन पीछे कोई विकृति नहीं छोड़ रहा


एसेवीएन किसी भी परियोजना का निर्माण शुरू करते समय पर्यावरण के प्रति अपनी संवेदनशीलता के मद्देनजर मलबे की वैज्ञानिक ढंग से डंिपंग करने के मानदण्ड को एक कारपोरेट संस्कृति के रूप में अंगीकृत करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि निर्माण के बाद परियोजना प्रभाव क्षेत्र का पुनरुरपायन एवं हरितकरण किया जाए और निर्माण की कोई निशानी शेष न रहे। 

जलविद्युत परियोजनाओं पर अक्सर दो कारणों से दोष मढ़ा जाता है। पहला कारण डूब क्षेत्रों एवं निर्माण स्थलों में बड़ी संख्या में लोगों का विस्थापन तथा दूसरा कारण मलबे की डंिपंग के कारण होने वाली पर्यावरणीय विकृति है। असल में संबंिधत निर्माण कार्यों का आकार एवं मात्रा इतनी विशाल एवं वृहद है कि लोगों द्वारा नुक्ताचीनी किया जाना कुदरती है। लेकिन रन-ऑफ-दि-रिवर किस्म की परियोजनाओं में डूब नगण्य होती है तथा अस्थायी निर्माण संरचनाएं तदुपरांत हटा दी जाती हैं तथा भूमि वापस उनके मालिकों को दे दी जाती है। हालांकि भूमिगत खुदाई में भारी मात्रा में मलबा बनता है जिसे ठिकाने लगाना चुनौतीपूर्ण होता है लेकिन उन मामलों को छोड़कर जहां पहले ही वैज्ञानिक तरीके से योजना बना ली जाती है। एसजेवीएन द्वारा निर्मित सबसे बड़े 1500 मेगावाट के एनजेएचपीएस के मामले को देखें तो पर्यावरणीय विकृति का मुश्किल ही कोई निशान नजर आता है।

डाउनस्ट्रीम की 412 मेगावाट क्षमता की आरएचईपी की बात ही कुछ और है, क्योंकि यह परियोजना अपस्ट्रीम की एनजेएचपीएस के आगे-पीछे ही काम करेगी। सुंग संरचनाएं भी अपेक्षाकृत कम हैं तथा विद्युत गृह भी अंशत सतह पर है। 10.5 मीटर व्यास की 15.127 कि.मी. लंबी सुंग खोदने के अलावा 40 मीटर व्यास एवं 150 मीटर उर्ध्वाकार गहरी सर्ज शाफ्ट रूपी सुंग तथा 3.8 मीटर व्यास तथा 54 मीटर लंबी 3 छोटी सुंगों से भारी मात्रा में निकलने वाले मलबे को ठिकाने लगाना किसी भी परियोजना के लिए एक बहुत बडी चुनौती है।

बड़े आकार की परियोजना का सफलतापूर्वक निर्माण करने के बाद एसजेवीएन की आरएचईपी के योजनाकार शुरू से ही आत्मविश्वास से पूर्ण थे। उत्तर भारत में सतलुज नदी पर 1500 मेगावाट के एनजेएचपीएस के डाउनस्ट्रीम में 412 मेगावाट की आरएचईपी ऐााó दूसरी परियोजना है जिसका निर्माण एसजेवीएन ने तेजी से शुरू किया है और इसे सितंबर,2013 तक पूरा किया जाना है।

सतलुज नदी घाटी बेसिन का अच्छी तरह मुआयना करके ऐा÷ स्थान चिन्हित करने की भरसक कोशिश की गई जहां निकले मलबे का संग्रहण इस ढंग से हो सके कि यह नदी में न गिरे, पर्यावरणीय विकृति उत्पन्न न करे तथा अन्ततः इसका पुनर्व्यवस्थीकरण हो सके ताकि भू-स्वरूप खराब न रहे।

आरंभिक डिजाइनों में अनुमान था कि समस्त निर्माण कार्यों से 30.63 लाख घन मीटर मलबा उत्पन्न होगा। इसमें से कुछ का पुनउपयोग करने के बाद 28.18 लाख घन मीटर मलबे को ठिकाने लगाने की व्यवस्था करना अपेक्षित था।

डंपिंग यार्डों के निर्माण के लिए परियोजना प्रभाव क्षेत्र के समांतर चार स्थल चिन्हित किए गए तथा किनारों एवं ढलानों पर पत्थर से बने डंगों सहित सुरक्षा ढांचों का निर्माण किया गया है।

पर्यावरण मुद्दों के प्रति कंपनी की संवेदनशीलता के परिप्रेक्ष में तत्संबंधी सिविल कार्य की संविदा में यह अनिवार्य प्रावधान था कि मलबा नदी में न डाला जाए। कड़ी निगरानी से सुनिश्चित हुआ है कि अनुबंध की शर्तों का पालन किया गया है।

सुंरग के निर्माण का कार्य प्रगति पर होने के साथ-साथ मलबा धीरे-धीरे जमा होने लगा। निर्माण कार्य के मध्य में सुंग के एक हिस्से में नई भू-गर्भीय चुनौतियों ने आकलनों को गड़बड़ा दिया ।

जहां एक ओर इंजीनियरों को अति प्रतिकूल चट्टान संरचनाओं के कारण सुंग का कार्य रोकना पड़ा, दूसरी ओर परियोजना के डिजाइनकार ऐा÷ छोटी बाईपास सुंगे खोदने की वैकल्पिक रणनीति बनाने लगे जिससे मुख्य सुंग का निर्माण कार्य आगे बढ़ सके।

सुंरग का मार्ग बदलने से पूर्व अपेक्षित से अतिरिक्त उत्पन्न 8.81 लाख घनफुट मलबे को ठिकाने लगाने के लिए अतिरिक्त जगह अपेक्षित थी।

इसे भाग्य का खेल ही समझें कि भारत सरकार द्वारा समीपवर्ती स्थल को समस्तरीय किया जाना था जिसके लिए भारी मात्रा में मलबा डालना अपेक्षित था और इस प्रकार पारस्परिक लाभ से एसजेवीएन को अतिरिक्त मलबे के लिए डंपिंग स्थल उपलब्ध हो गया।

केन्द्रीय सरकार के रणनीतिक स्थल की लेबलिंग के लिए मलबे का उपयोग करने के अलावा बायल गांव के तीन बाशिन्दों - छाताराम, अमरचन्द तथा तारादेवी ने मलबे को उनकी निजी भूमि में डंप करने हेतु एसजेवीएन से संपर्क साधा ताकि खड़ी ढ़लान को लेवल किया जा सके। इन मौकों का लाभ उठाने का निर्णय जल्द लिया गया। इन दो स्थलों के अलाव सतलुज नदी के पास दत्तनगर में एसजेवीएन की बन रही आवासीय कॉलोनी में ग्राउंड की लेवलिंग के लिए भी कुछ मलबे का उपयोग किया गया।

मलबे को निपटाने के लिए भूमि की अतिरिक्त खरीद नहीं की गई तथा एसजेवीएन द्वारा तत्संबंधी प्रबंधन के कारण किसी जगह पर्यावरणी विकृति उत्पन्न नहीं हुई। पत्थरों के सुदृढ़ डंगों के कारण मलबा उनसे बाहर नहीं निकलता। डंप किया मलबा रिपोज पर 250 के कोण से अधिक पर झुकाव लिए है और इसका पुनर्स्थापन एवं पुनउपयोग भी शुरू हो गया है।

परियोजना की कमीशनिंग से पहले सभी मलबा डंपिंग स्थलों के हरितकण का लक्ष्य है। एक यार्ड पर आजमाइशी तौर पर नई भू-हरित अपरदन नियंत्रण आवरण की विधि अपनाई गई है जिससे बेजान मिट्टी को पुनर्जीवित करने तथा पौधों एवं झाड़ियों की पौध को सहारा देने में कामयाबी मिली है। 

 इस प्रयोगात्मक परियोजना हेतु हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से मंजूरी मिल गई है तथा हरितकरण प्रक्रिया दोहराई जाएंगी ताकि समूचे मलबा डंपिंग यार्डों पर हरित आवरण बिछाने का लक्ष्य तय समय से पहले पूरा हो सके।

   

सर्वाधिकार सुरक्षित एसजेवीएन लिमिटेड