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परियोजना ने सब कुछ बदला दिया है, जिन्दगी पहले इतनी सुखद नहीं थी
एसजेवीएन कॉलोनी की वासी सेवानिवृत्ति की जिन्दगी जी रही सत्या देवी (60) को अपनी पिछली चरवाहे की जीविका को छोड़कर परियोजना पुनर्वास कॉलोनी में नई सुकून भरी जिन्दगी अपनाने का कोई मलाल नहीं है। अलबत्ता वो शाम को चूल्हे के ईर्द-गिर्द बतियाते हुए ऊîन कातना जरूर याद करती
हैं।
वे कहती हैं कि हमारे इलाके में परियोजना आने तथा झाकड़ी कॉलोनी स्थापित होने से पहले रोजमर्रा की जिन्दगी सुबह चूल्हा जलाने, खेतों पर काम करने, गायों एवं भेड़ों के चारापानी, जलाऊî लकड़ी इकट्ठा करने गांवों के कुओं से जल अपनी पीठ पर ढोने तक सीमित थी।
बीते दिनों की याद करके वे बताती हैं कि झाकड़ी छित्तरा हुआ गांव था, जहां छोटे-छोटे घर थे। गरीबी काफी थी तथा सूखे के दौरान कई दिन भूखे रहकर काटते थे। अधिशेष अन्न के मालिक अमीर किसान मजलूमों को काम के बदले में अनाज देते थे।
परंतु अब यह सब बदल चुका है। चारों ओर समृद्धि है। कॉलोनी तथा आसपास के इलाके के लगभग सभी परिवार के पास वाहन हैं और वे कहती हैं कि परियोजना के अस्तित्व में आए बिना इन सबकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
वे तुलना करते हुए अपना विगत चरवाहा जीवन याद करती हैं। 100 से 150 भेड़ों के अलावा उनके पास लगभग 15 से 20 पशु थे, तब भी दूध की उपलब्धता अपर्याप्त थी। खेती के लिए बैल जरूरी थे।
इलाके में थोड़े-बहुत सामान के साथ मात्र एक दुकान थी और हर एक को कपड़े, बर्तन, खेती के औजार, राशन तथा कई अन्य मदें खरीदने के लिए रामपुर जाना पड़ता था।
मात्र 13 कि.मी. दूर रामपुर के लिए हर समय कई वाहन आते-जाते रहते हैं। लेकिन उस समय सड़क की हालत खराब थी तथा रामपुर एवं झाकड़ी के बीच मात्र एक ही बस चलती थी। यदि किसी वजह से यह छूट जाती तो इसे फिर पकड़ने के लिए पूरे एक दिन का इंतजार करना पड़ता था।
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| सत्या देवी |
भेड़े पालना और ऊन कातने का सतत कार्य सभी को बिजी रखता था। ऊîनी वस्त्र आम तौर पर घर में ही तैयार होते थे, जो कड़ी सर्दियों में सहारा बनते थे। कोई कम्बल नहीं थे और घर पर तैयार ऊîनी रजाईयां इस्तेमाल होती थी।
किसी के बीमार पड़ने पर चिकित्सकीय देखरेख के लिए एकमात्र सहारा हर महीने में एक बार घर-घर का दौरा करने वाला गांव का कपाॐडर (पैरामेडिक) था।
उक्त की तुलना आज झाकड़ी कॉलोनी में एक दन्त चिकित्सक सहित पांच डाक्टरों द्वारा संचालित एक अस्पताल है, जो प्रारंभिक निदानात्मक जांच के लिए एक्स-रे मशीन तथा परीक्षणशीला से लैस है।
दिल्ली पब्लिक स्कूल में पढ़ रहे सत्या देवी के एक पौत्र एवं एक पौत्री की इस अस्प्ताल में नियमित चिकित्सकीय जांच होती है। इस छोटे से अस्पताल द्वारा संचालित एक मोबाईल कि क्लीनिक के जरिए आसपास के कई गांवों को स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
सत्या देवी के अब 34 वर्षीय पुत्र विनोद नेगी के एसजेवीएन में 16 साल से नौकरी में लगे होने से परिवार को अपनी जिन्दगियों में आए बदलाव को धीरे-धीरे आत्मसात करने में मदद मिली है।
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| विनोद नेगी एवम् उनकी पत्नि |
खेती की अपनी अधिकांश जमीन परियोजना की खातिर दे देने वाले परिवार से संबंिधत विनोद का कहना है कि " 18 वर्ष के होने पर स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद झाकड़ी परियोजना अधिकारियों द्वारा नौकरी उपलब्ध कराने से हमारे परिवार को अन्य के साथ आगे बढ़ने में मदद मिली है।
शालीनतापूर्ण मेहमाननबाजः चायपान के पश्चात् सत्या देवी अन्त में कहती हैं कि " परियोजना ने सब कुछ बदल दिया है, जिन्दगी पहले इतनी सुखद नहीं थी। अलबत्ता, जलती अंगीठी के पास ऊîन बुनने के अपने पुराने दिन कभी-कभी मुझे जरूर याद आते हैं। "
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